Tuesday, January 16, 2007

अब तो बदल रहे हैं

गजलः १६१

स्वप्न आँखों में बसा पाए न हम
आँसुओं से भी सजा पाए न हम.

किस गिरावट ने हमें ऊंचा किया
कोई अंदाजा लगा पाए न हम.


दर्द के आँसू बहुत हमने पिये
गै़र का अहसां उठा पाए न हम.

हमने अश्कों से लिखी थी जो गज़ल
दुख है ये तुमको सुना पाए न हम.

आईना अपनी ही सब कहता रहा
हाले-दिल अपना सुना पाए न हम.

आज़माए हौसले हमने सदा
छू बुलँदी को कभी पाए न हम.

**

गजलः १६४

ज़ूकाफिया और यक काफिया गज़ल

अच्छाइयों के ढ़ब सब अब तो बदल रहे हैं.
रुसवाइयों के भी ढ़ब अब तो बदल रहे हैं.


कैसी चली हवाएँ, मस्ती में गुम है सारे
आज़ादियों के भी ढ़ब अब तो बदल रहे हैं.

आबादियों में जिँदा, बरबाद फिर भी आदम
बरबादियों के भी ढ़ब अब तो बदल रहे हैं.

खन खन खनकती दौलत मुशकिल करे है
जीनाआसानियों के भी ढ़ब अब तो बदल रहे हैं.

जँजीर वादों की पहना, यह वक्त ही नचाये
मजबूरियों के भी ढ़ब अब तो बदल रहे हैं.

शादी की महफिलें हों, मातम की मजलसें भी
शहनाइयों के भी ढ़ब अब तो बदल रहे हैं.

है भीड़ में अकेला क्यों आज का ये आदम
तन्हाइयों के भी ढ़ब अब तो बदल रहे हैं.

दुशवारियों से ढाँपे तन, मन, बदन ऐ देवी
अंगड़ाइयों के भी ढब, अब तो बदल रहे हैं.

**

क्या हमारे दिल में है


गजलः१५३


हम अभी से क्या बताऐं क्या हमारे दिल में है
कश-म-कश मे हैं अभी हम, हर कदम मुशकिल में है.


यूं तो रौनक हर तरफ है फिर भी दिल लगता नहीं
क्या बताएं हम किसी को क्या कमी महफ़िल में है.

पूछो उससे बोझ हसरत का लिये फिरता है जो
क्या मज़ा उस ज़िंदगी में, गुज़री जो किल किल में है.

कांपती है सोच की कश्ती मेरी मंझदार में
बरकरार उम्मीद इस पर भी लबे - साहिल में है.

धूप से तपती हुई वीरान है राहें सभी
शबनमी अंदाज़ देवी देख क्या मँजिल में है.

**

गजलः १५६

भटके हैं तेरी याद में जाने कहां कहां.
तेरी नज़र के सामने खोये कहां कहां.

रिशतों की डोर में बंधे जाते कहां कहां
उलझन में राहतें कोई ढूंढे कहां कहां.

ख़ाहिश की कै़द में सदा जीवन किया बसर
अब उसके रास्ते खुले जाके कहां कहां.

ऐ जिंदगी सवाल तू, तू ही जवाब है
तुझसे मिलन की आस में भटके कहां कहां.

क़दमों के क्यों मिटा दिये उसने निशां तमाम
हम उनकी पैरवी में भी जाते कहां कहां.

है दाग़ दाग़ दिल मेरा मुस्कान होंट पर
रौशन हुए है रास्ते, दिल के कहां कहां.

वो लामकां में रहता है, अपनी बिसात क्या
हम लामकां को ढूंढते फिरते कहां कहां.

देवी न मुझसे पूछिये कुछ खुद को देखिये
होते है इस जहान में झगड़े कहां कहां.

**


ग़ज़ल: १५८

उस शिकारी से ये पूछो पर क़तरना भी है क्या

पर कटे पंछी से पूछो उड़ना ऊँचा भी है क्या?

आशियाना ढूंढते हैं, शाख से बिछड़े हुए

गिरते उन पत्तों से पूछो, आशियाना भी है क्या?

अब बायाबां ही रहा है उसके बसने के लिए

घर से इक बर्बाद दिल का यूँ उखड़ना भी है क्या?

महफ़िलों में हो गई है शम्अ रौशन, देखिए

पूछो परवानों से उसपर उनका जलना भी है क्या?

वो खड़ी है बाल खोले आईने के सामने

एक बेवा का संवरना और सजना भी है क्या?

पढ़ ना पाए दिल ने जो लिखी लबों पर दास्ताँ
दिल से निकली आह से पूछो कि लिखना भी है क्या?

जब किसी राही को कोई रहनुमां ही लूट ले

इस तरह देवी भरोसा उस पे रखना भी है क्या.

**

गज़ल: १५९

यूँ मिलके वो गया है कि मेहमान था कोई

उसका वो प्यार मुझपे इक अहसान था कोई.

वो राह में मिला भी तो कुछ इस तरह मिला

जैसे के अपना था न वो, अनजान था कोई.

घुट घुट के मर रही थी कोई दिल की आरज़ू

जो मरके जी रहा था वो अरमान था कोई.

नज़रें झुकीं तो झुकके ज़मीं पर ही रह गईं

नज़रें उठाना उसका न आसानं था कोई.

था दिल में दर्द, चेहरा था मुस्कान से सजा

जो सह रहा था दर्द वो इन्सान था कोई.

उसके करम से प्यार-भरा, दिल मुझे मिला

देवी वो दिल के रूप में वरदान था कोई.

**

Sunday, November 26, 2006

मुख़्तसर, मुख़्तसर, मुख़्तसर


८०. गज़ल

बददुआओं का है ये असर
हर दुआ हो गई बेअसर.१

ज़ख्म अब तक हरे है मिरे
सूख कर रह गए क्यों शजर?२

यूं न उलझो सभी से यहां
फितरती शहर का है बशर.३

राह तेरी मेरी एक थी
क्यों न बन पाया तू हमसफर.४
वो मनाने तो आया मुझे
रूठ कर खुद गया वो मगर.५

चाहती हूं मैं देवी तुझे
सच कहूं किस कदर टूटकर.६
॰॰
८० गज़ल
मैं खुशी से रही बेखबर
गम के आँगन में था मेरा घर.१
रक्स करती थी खुशियां अभी
ग़म उन्हें ले गया लूटकर.२
आशना ढूंढते ढूंढते
खोया मैंने तो अपना ही घर.३
गुफ्तगू जिनसे होती रही
उनको देखा नहीं आँख भर.४
दिल की चाहत को चोंटें लगी
कैसे बिखरी है वो टूटकर.५
कैसे परवाज़ देवी करे
नोचे सय्याद ने उसके पर.६
॰॰
८१. गज़ल

मुख़्तसर, मुख़्तसर, मुख़्तसर,
रह गई जिंदगी अब मगर.

ज़ाइका तो लिया उम्र भर
समझे अम्रत मगर था जहर.

उम्र सारी थे साहिल पे हम
प्यास लेकर के लौटे है पर.

बनके बेखौफ चलते हो क्यों?
मौत तेरी सदा हम सफर.

अपने दामन में खुशियां तो थीं
कुछ रुकी, फिर चली रूठकर.

गँगा जाकर नहाया बहुत
मैल औरों की लाये थे घर.

ना समझ तुम न देवी बनो
अब है जाना तू घर ख़ाली कर.


अपने ही घर को जलाया


गज़लः९४
चराग़ों ने अपने ही घर को जलाया
जहाँ की नजर में तमाशा बनाया.१
बहुत आज़माया है अपनों को हमने
मुकद्दर ने जब जब हमें आज़माया. २
जो शमा मेरे साथ जलती रही हो
अँधेरा उसी रोशनी का है साया. ३
रही राहतों की बड़ी मुँतज़र मैं
मगर चैन दुनियां में हरगिज़ न पाया.४
सँभल जाओ अब भी समय है ऐ देवी
कयामत का अब वक्त नज़दीक आया.४
॰॰
गजलः ९५
वो अदा प्यार भरी याद मुझे है अब तक.
बात बरसों की मगर कल की लगे है अब तक.१
हम चमन में ही बसे थे वो महक पाने को
ख़ार नश्तर की तरह दिल में चुभे है अब तक.२
जा चुका कब का ये दिल तोड़ के जाने वाला
आखों में अश्कों का ये दरिया बहे है अब तक.३
आशियां जलके हुआ राख ज़माना पहले
और रह रह के धुआँ उसका उठा है अब तक.४
क्या खबर वक्त ने कब घाव दिये थे देवी
सँग दिल हो न सके खून बहे है अब तक.७
॰॰
गज़लः९६
देख कर तिरछी निगाहों से वो मुस्काते हैं
जाने क्या बात मगर करने से शरमाते हैं.१
मेरी यादों में तो वो रोज चले आते हैं
अपनी आँखों में बसाने से वो कतराते हैं.२
दिल के गुलशन में बसाया था जिन्हें कल हमने
आज वो बनके खलिश जख्म दिये जाते हैं.३
बेवफा मैं तो नहीं हूं ये उन्हें है मालूम
जाने क्यों फिर भी मुझे दोषी वो ठहराते हैं.४
मेरी आवाज़ उन्होंने भी सुनी है, फिर क्यों
सामने मेरे वो आ जाने से करताते हैं.५
दिल के दरिया में अभी आग लगी है जैसे
शोले कैसे ये बिना तेल लपक जाते हैं.६
रँग दुनियां के कई देखे है देवी लेकिन
प्यार के इँद्रधनुष याद बहुत आते हैं. ७

Tuesday, November 21, 2006

है गुले दिल हरा भरा मेरा.


६५.गजल
जो मुझे मिल न पाया रुलाता रहा
याद के गुलिस्ताँ में वो आता रहा.१
हर तरफ आग ही आग है उठ रही
आँसुओं से उसे मैं बुझाता रहा.२
हौसले टूटकर सब बिखरने लगे
गीत फिर भी मैं खुदको सुनाता रहा.३
होश कब था हमें लूटता जब रहा
जहर बन कर वो साकी पिलता रहा.४
जिँदगी हसरतों का दिया है मगर
आँधियों से वही टिमटिमाता रहा.५
ये अलग बात थी पत्थरों में बसा
काँच के घर को अपने बचाता रहा.६
दौर देवी गया जो गुजर कर अभी
याद बीते दिनों की दिलाता रहा.७
**

७२. गजल

कसमासाता बदन रहा मेरा
चूम दामन गई हवा मेरा.१

मुझको लूटा है बस खिज़ाओं ने
है गुले दिल हरा भरा मेरा.२

तन्हा मैं हूं, तन्हा राहें भी
साथ तन्हाइयों से रहा मेरा.३

खोई हूं इस कद्र जमाने में
पूछती सबसे हूं पता मेरा.४

आईना क्यों कुरूप इतना है
देख उसे अक्स डर रहा मेरा.५

मेरी परछाई मेरी हम दम है
सफर आसान अब हुआ मेरा.६

मैं अंधेरों से आ गई बाहर
जब से दिल और घर जला मेरा.७

जिसने भी दी दुआ मुझे देवी,
काम आसान अब हुआ मेरा.८

**


७५. गजल
अपनी आशाओं का दुश्मन आज बनता हर कोई
ना उम्मीदी से उम्मीदें क्यों है रखता हर कोई. १

छाँव की जिनको तलब वो ढूंढ हरियाली रहे
धूप की शिद्दत रहे तो फिर है बचता पर कोई.२

जिँदगी मौका सदा तो दूसरा देती नहीं
आजमाइश पर नहीं पूरा उतरता हर कोई.३

भीड में भी शोर से उकता गई हूं मैं तो अब
चल वहाँ ऐ दिल जहाँ तन्हा है रहता हर कोई.४

देता है विश्वास क्यों धोखा यहाँ इन्सान को
फिर भी है विश्वास पर विश्वास करता हर कोई.५

जिंदगी के इस लम्हें को कोई जी लेता है , पर
उस लम्हें को जिंदगी भर क्यों तरसता हर कोई.६

अपनी गलती का रहा अहसास देवी को सदा
काश इतनी बात मेरी भी समझता हर कोई. ७



Sunday, November 19, 2006

खुदा जाने कहां पर था


गज़लः १०१

इधर खोजा उधर खोजा खुदा जाने कहां पर था
वो धरती पर कहाँ मिलता मुझे जो आसमाँ पर था.१

वफा मेरी नजर अंदाज़ कर दी उन दिवानों ने
मेरी ही नेकियों का जिक्र कल जिनकी जुबाँ पर था.२

भरोसा दोस्त से बढ़कर किया था मैंने दुशमन पर
मेरा ईमान हर लम्हां बड़े ही इम्तहां पर था.३

थी जिसने नोच ली अस्मत, बड़ी जालिम वो हस्ती है
मगर इल्जाम बदकारी का आखिर बेजुबाँ पर था.४

ये आसूं, आंहे, पीडा, दर्द सारे दिल की फसलें है
मुहब्बत का जमाना बोझ इक कल्बे जवां पर था.५

गुजारी ज़िंदगी बेहोश होकर मैंने दुनियां में
मेरा विशवास सदियों से न जाने किस गुमां पर था.६

बहुत से आशियाने थे गुलिस्तां में, मगर देवी
सितम बर्के तपां का सिर्फ मेरे आशियां पर था.७

**

गज़लः १०२

यूं उसकी बेवफाई का मुझको गिला न था
इक मैं ही तो नहीं जिसे सब कुछ मिला ना था.१

लिपटे हुए थे झूठ से कोई सच्चा न था
खोटे तमाम सिक्के थे, इक भी खरा ना था.२

उठता चला गया मेरी सोचों का कारवां
आकाश की तरफ कभी, वो यूं उड़ा ना था.३

रिश्तों की डोर में बँधे जो आदमी दिखे
धागा बँधा तो बीच में इक भी दिखा ना था.४

माहौल था वही सदा, फितरत भी थी वही
मजबूर आदतों से था, आदम बुरा ना था.५

जिस दर्द को छुपा रक्खा मुस्कान के तले
बरसों में एक बार भी कम तो हुआ ना था.६

ढोते रहे है बोझ तिरा जिंदगी सदा
जीने में लुत्फ क्यों कोई बाकी बचा ना था.७
**

गज़लः १०७
ठहराव जिंदगी में दुबारा नहीं मिला
जिसकी तलाश थी वो किनारा नहीं मिला.१

वर्ना उतारते न समँदर में कशतियां
तूफान आए जब भी इशारा नहीं मिला.२

मेरी लडखडाहटों ने सँभाला है आज तक
अच्छा हुआ किसीका सहारा नहीं मिला.३

बदनामियां घरों में दबे पाँव आ गई
शोहरत को घर कभी भी, हमारा नहीं मिला.४

खुशबू, हवा और धूप की परछाइयां मिली
रौशन करे जो शाम, सितारा नहीं मिला.५

खामोशियां भी दर्द से देवी है चीखती
हम सा कोई नसीब का मारा नहीं मिला.६
**

गज़लः १११

तेरी रहमतों में सहर नहीं
मेरी बँदगी में असर नहीं? १

जिसकी रहे नेकी निहां
कहीं कोई ऐसा बशर नहीं?२

जिसे धूप दुख की न छू सके
कोई ऐसा दुनियाँ में घर नहीं?३

तन्हाई, साया साथ है
बेदर्द खुशियां मगर नहीं.४

जिसे लोग कहते हैं जिंदगी
देवी इतनी आसां सफर नहीं.५

कितना मुश्किल हो गया

ग़ज़ल: ४७

आँसुओं का रोक पाना कितना मुश्किल हो गया
मुस्करहट लब पे लाना कितना मुश्किल हो गया.१

बेखुदी में छुप गई मेरी खुदी कुछ इस तरह
ख़ुद ही ख़ुद को ढूंढ पाना कितना मुश्किल हो गया.२

जीत कर हारे कभी, तो हार कर जीते कभी
बाज़ियों से बाज़ आना कितना मुश्किल हो गया.३

बिजलियूँ का बन गया है वो निशाना आज कल
आशियाँ अपना बचाना कितना मुश्किल हो गया.४

हो गया है दिल धुआँ सा कुछ नज़र आता नहीं,
धुंध के उस पार जाना कितना मुश्किल हो गया.५

यूँ झुकाया अपने क़दमों पर ज़माने ने मुझे
बंदगी में सर झुकना कितना मुश्किल हो गया.६

साथ देवी आपके मुश्किल भी कुछ मुश्किल न थी
आपके बिन मन लगाना कितना मुश्किल हो गया.७

**

ग़ज़ल: ४८

दोस्तों का है अजब ढ़ब, दोस्ती के नाम पर
हो रही है दुश्मनी अब, दोस्ती के नाम पर.१

इक दिया मैने जलाया, पर दिया उसने बुझा
सिलसिला कैसा ये या रब, दोस्ती के नाम पर.२

दाम बिन होता है सौदा, दिल का दिल के दर्द से
मिल गया है दिल से दिल जब, दोस्ती के नाम पर.३

जो दरारें ज़िंदगी डाले, मिटा देती है मौत
होता रहता है यही सब, दोस्ती के नाम पर.४

किसकी बातों का भरोसा हम करें ये सोचिए
धोखे ही धोखे मिलें जब, दोस्ती के नाम पर.५

कुछ न कहने में ही अपनी ख़ैरियत समझे हैं हम
ख़ामुशी से है सजे लब, दोस्ती के नाम पर.६

दिल का सौदा दर्द से होता है देवी किसलिए
हम समझ पाए ना ये ढ़ब, दोस्ती के नाम पर.७

**
ग़ज़ल: ४९
उस शिकारी से ये पूछ पैर क़तरना भी है क्या?
पर कटे पंछी से पूछो उड़ना ऊँचा भी है क्या?

आशियाँ ढूंढते है, शाख से बिछड़े हुए
गिरते उन पतों से पूछो, आशियाना भी है क्या?

अब बायाबान ही रहा है उसके बसने के लिए
घर से इक बर्बाद दिल का यूँ उखाड़ना भी है क्या?

महफ़िलों में हो गई है शम्अ रौशन , देखिए
पूछो परवानों से उसपर उनका जलना भी है क्या?

वो खड़ी है बाल बिखेरे आईने के सामने
एक बेवा का संवरना और सजना भी है क्या.
पढ़ ना पाए दिल ने जो लिखी लबों पे दास्ताँ
दिल से निकली आह से पूछो कि लिखना भी है क्या.

जब किसी राही को कोई राहनुमां ही लूट ले
इस तरह देवी भरोसा उस पे रखना भी है क्या.

**
ग़ज़ल: ५०

यूँ मिलके वो गया है कि मेहमान था कोई
वो प्यार नहीं मुझपे इक अहसान था कोई.१

वो राह में मिला भी तो कुछ इस तरह मिला
जैसे के अपना था न वो, अनजान था कोई.२

घुट घुट के मर रही थी कोई दिल की आरज़ू
जो मरके जी रहा था वो अरमान था कोई.३

नज़रें झुकी तो झुक के ज़मीन पर ही रह गई
नज़रें उठाना उसका न आसानं था कोई.४

था दिल में दर्द, चेहरा था मुस्कान से सज़ा
जो सह रहा था दर्द वो इन्सान था कोई. ५

उसके करम से प्यार-भरा, दिल मुझे मिला
देवी वो दिल के रूप में वरदान था कोई.६

Saturday, November 18, 2006

खाहिशों से सजा के घर रक्खा


फिर खुला मैंने दिल का दर रक्खा
खाहिशों से सजा के घर रक्खा.१

मैं निगहबाँ बनी थी औरों की
अपने घर को ही दाव पर रक्खा.२

मँजिलों की तलाश में भटकी
साथ फिर भी न राह पर रक्खा.३

तीर पहुंचा मुकाम पर अपने
यूं निशनाने पे अपना सर रक्खा.४

कुछ कहा और कुछ न कह पाए
जब्त खुद पर उम्र भर रक्खा.५

सोचना छोड़ अब तो ऐ देवी
फैसला जब अवाम पर रक्खा.६

गुबार ही गुबार है


ये कौन आ गया भला ये किस कदर खुमार है
ऋतू तो नहीं बहार की फिर भी लगे बहार है.१

दोस्तों दुशमनों में भी उसका न अब खुमार है
ऐसी कतार में खदा वो आज पहली बार है.२

मैं जिस ज़मीं पे हूँ खडी, गुबार ही गुबार है
है दिल में सबकी नफरतें, खुलूस है न प्यार है.३

ऐ दिल चलो चलें मगर,जरा सा दम तो ले कहीं
मँजिल नहीं है सामने, रस्ते यहां हजार है.४

है कौन जिससे कह सकूं, जख्मे जिगर की बात मैं
मैं सबको आजमा चुकी, कोई न राजदार है.५

वीरान दिल की राह पर, आहट न कोई है सदा
शाम आ गई सहर हुई, क्यों किसका इन्हजार है. ६

हम मुस्कराने की सजा पाते रहे हैं उम्र भर
देवी हमारी जिंदगी हर वक्त अश्कबार है. ७

ऐ ज़िंदगी न पढ़ सकी


गजल
देते है जख्म खार तो देते महक गुलाब
फिर भी मैं तोड लाई हूँ, उनको अजी जनाब. १

कोई समझ न पाए तो फिर जिँदगी सवाल
गहराइयों में उसकी है हर बात का जवाब.२

पढ़ते पढ़ाते ही रही नादान मैं गँवार
ऐ ज़िंदगी न पढ़ सकी तेरी कभी किताब.३

उलझो न आँधियों से कभी मात खाओगे
सीना न तान कर चलो मौसम बडा खराब.४

ये सल्तनत का शौक नशीली शराब सा
लोगों के वोट जीत के बनते रहे नवाब.५

इक आरजू है दिल में पली उसके दीद की
मेरा हीबब बस रहा मुझमें जो बेहिजाब.६

देवी बहुत सुने है सुर राग रागिनी
मदहोश जो करे वही घट में बजे रबाब. ७
॰॰

गजल

किस्मत हमारी हमसे ही मांगे है अब हिसाब
ऐसे में तुम बताओ हम क्या दें उन्हें जवाब.१

अच्छाइयां बुराइयाँ दोनों हैं साथ साथ
इस वास्ते हयात की रँगीन है किताब.२

घर बार भी यही है, परिवार भी यही
घर से निकल के देखा तो दुनियां मिली ख़राब.३

पूछूंगी उससे इतने ज़माने कहां रहे
मुझको अगर मिलेंगे कहीं भी वो बेनकाब.४

मुस्काते मंद मंद हैं हर इक सवाल पर
ऐसी अदा जवाब की है हसींन लाजवाब.५

पिघले जो दर्द दिल के, सैलाब बन बहे
आंखों के अश्क है पिये मैंने समझ शराब.६

देवी सुरों को रख दिया मैंने संभालकर
जब दिल ने मेरे सुन लिया बजता हुआ रबाब.७


Monday, November 13, 2006

ऐ दिल बता

२१२२,२१२२,२१२

ज़ख्म दिल का अब भरा तो चाहिये
बा असर उसकी दवा तो चाहिये.१

खींच ले मुझको जो वो अपनी तरफ
शोख़ सी कोई अदा तो चाहिये.२

उसकी हो सूरत भली, सूरत भली
फिर भी वो लिक् पढ़ा तो चाहिये.३

जिनको मिलती है हमेशा ही दग़ा
उनको भी थोड़ी वफा तो चाहिये.४

काम अच्छा या बुरा, जो भी हुआ
उसका मिलना कुछ सिला तो चाहिये.५

जलते बुझते जुगनुओं की सही
ज़ुल्मतों में कुछ ज़िया तो चाहिये.६

मैं मनाऊं भी किसे, ऐ दिल बता
रूठ कर बैठा हुआ तो चाहिये.७

दिलकश जुबान है तेरी

२१२२,१२१२,२२ खफीफ

खुबसूरत दुकान है तेरी
हर नुमाइश में जान है तेरी.१

यूं तो गूंगी ज़ुबान है तेरी
हर तमन्ना जवान है तेरी.२

बेटी इक तो जवान है तेरी
उसपे कडवी जुबान है तेरी.३

कुछ तो काला है दाल में शायद
ळड़खड़ाती जुबान है तेरी.४

फूल सा दिल लगे है कुम्हलाने
आग जैसी ज़ुबान है तेरी.५

चीर कर तीर ने रखा दिल को
टेढ़ी चितवन कमान है तेरी.६

सारा आकाश नाप लेता है
कितनी ऊंची उड़ान है तेरी.७

पेट तुकडों पे पल ही जाता है,
अब ज़रूरत मकान है तेरी.८

तुझ को पढ़ते रहे तभी जाना
देवी दिलकश जुबान है तेरी.९

वफा पे जिसकी हमें नाज़ था

२२१,२१२१,१२२१,२१२

मिलने की हर घड़ी में बिछडने का गम हुआ
फिर भी हमें खुशी थी, कि उनका करम हुआ.१

नजरें मिली तो मिलके, वो झुकती चली गईं
फिर भी हया का बोझ न कुछ उनपे कम हुआ. २

कुछ और भी गुलाब थीं आंखें ख़ुमार में
कुछ और भी हसीन वो मेरा सनम हुआ. ३

कुछ तो चढ़ा था पहले हि हम पर नशा, मगर
कुछ आपका भी सामने आना सितम हुआ. ४

आती नहीं है प्यार की खुशबू कहीं से अब
खिलना ही जैसे प्यार के फूलों का कम हुआ. ५

अरमान का वो शहर था नज़रों से दूर दूर
फिर भी वो आस पास था, ऐसा भरम हुआ.६

देवी वफा पे जिसकी हमें नाज़ था बहुत
वो बेवफा हुआ तो, बहुत हमको गम हुआ.७

कभी ऐ हकीकते मुंतज़िर..

११२१२,११२१२ ..
कभी ऐ हकीकते मुंतज़िर..

उसे इश्क क्या है पता नहीं
कभी शम् अ पर वो जला नहीं.१

वो जो हार कर भी है जीतता
उसे कहते हैं वो जुआ नहीं.२

है अधूरी सी मेरी जिंदगी
मेरा कुछ तो पूरा हुआ नहीं.३

यूँ तों देखने में वो सख्त है
वैसे आदमी वो बुरा नहीं.४

जो मिटा दे मेरी उदासियां
कभी साज़े दिल यूं मिला नहीं.५

न बुझा सकेंगी ये आँधियां
ये चिराग़े दिल है, दिया नहीं.६

मेरे हाथ आई बुराइयां
मेरी नेकियों को गिला नहीं.७

मैं जो अक्स दिल का उतार लूं
मुझे आइना वो मिला नहीं.८

Sunday, April 23, 2006

इक प्यास में हमेशा

महफिल में शमा क्यों कर अब तक मचल रही है
मधिम सी रौशनी में वो खुद ही जल रही है॥

इक प्यास में हमेशा रातें सरक रही है
तुझे देखने को आँखे अब तक तरस रही है॥

ऐसे न डूबते हम गर हाथ थाम लेते
मौजों की गोद में अब कश्ती सँभल रही है॥

था मर्ज वो पुराना जिसकी न थी दवा भी
तेरी निगाह शफा का अब काम कर रही है॥

अनजान राह पर यूँ, चलना न था मुनासिब
फिर भी चुनौती बनके हर साँस चल रही है़॥

यूँ तो किया मुतासिर मुझे जिँदगी ने देवी
क्यों ठोकरों ने जाने कर दर बदर रही है॥

बदनाम नाम वाले

बदनामियों के भी ढँग, अब तो बदल रहे हैं
रुसवाइयों के भी ढँग, अब तो बदल रहे हैं ॥

कैसी चली हवाएँ, जहरीली ये खिजाएँ
आजादियों के भी ढँग, अब तो बदल रहे हैं ॥

अबादियों में जिँदा, बरबाद फिर भी आदम
बरबादियों के भी ढँग, अब तो बदल रहे हैं ॥

कैसे खनकती दौलत, मुशकिल करे ये जीना
दुशवारियों के भी ढँग, अब तो बदल रहे हैं ॥

जँजीर वादों की पहना, यह वक्त ही नचाये
मजबूरियों के भी ढँग, अब तो बदल रहे हैं ॥

है शादमाने कहीं तो, मातम की महफिलें भी
शहनाइयों के भी ढँग, अब तो बदल रहे हैं ॥

है भीड में अकेला अब आज का ये आदम
तन्हाइयों के भी ढँग, अब तो बदल रहे हैं

दुशवारियो से ढाँपे तन, मन, बदन ऐ देवी
अच्छाइयों के भी ढँग, अब तो बदल रहे हैं ॥

सच हमें सहला रहा

सपने में "सच" आ हमें सहला रहा
खोल आँखें झूठ है बहला रहा॥

आँसुओं की नींव पर शीशेमहल
पत्थरों की चोट से बचता रहा॥

अब खिजाँ, कल हो बहारें क्या पता
वक्त मौसम की तरह चलता रहा॥

सब यहाँ है पाप भी और पुण्य भी
हाथ इक दे दूसरा लौटा रहा॥

अब न शामिल है खुशी गम में मेरे
कल खुशी को देख गम हसता रहा॥

शेर चँद "वाह वाह" के लायक जब हुए
खुद को गालिब देवी क्यों कहला रहा॥

ये खिजाँओं का ऐ कली

ये खिजाँओं का ऐ कली मौसम नहीं
तेरी खुशबू में ही लगता दम नहीं॥

स्वप्न आँखों ने तराशा था जो, उसे
आँसुओं से भी हुआ है नम नहीं॥

मौत का क्यों खौफ दिल में बस गया
जीने से बेहतर यहाँ मौसम नहीं॥

हम बहारों के नहीं आदी बहुत
इसलिये बरबादियों का गम नहीं॥

आशियाँ दिल का रहा उजडा हुआ
सज रही है बज्म पर सरगम नहीं॥

जशन किस किस का मनाऊँ देवी मैं
गम खुशी का दिल में जब मातम नहीं॥

बहूत ऊँचा है उठे गिर कर

बहुत ऊँचा है उठे गिर कर सनम
अब तो नीचे देख कर डरते है हम॥

स्वप्न आँखों ने तराशा था उसे
आँसुओं से भी सजा पाए न हम॥

दर्द के आँसू बहुत हमने पिये
पर न जाने क्यों बहक पाए न हम॥

आईना बातें हमीं से कर रहा
मोड सच से मुँह तब पाए न हम॥

होश में है जिंदगी बेहोश हम
लडखडाहट में सँभल पाए न हम॥

गर्दिशे तकदीर समझ पाए न हम

गर्दिशे तकदीर समझ पाए न हम
हाथ की रेखा बदल पाए न हम॥

होश में है जिंदगी बेहोश हम
लडखडाहट में सँभल पाए न हम॥

अश्क की स्याही से लिखी जो गजल
दुख यही है गा मगर पाए न हम॥

फूल जैसे मखमली रिश्ते सभी
खलिश उनमें क्यों समझ पाए न हम?

आजमाए हौसले हमने सदा
छू बुलँदी भी मगर पाए न हम॥

आईना बातें हमीं से कर रहा

आईना बातें हमीं से कर रहा
देख उसको अक्स मेरा डर रहा॥

तुम ह्रदय का हार हो परवरदिगार
आत्मा! तेरे लिये "तन" घर रहा॥

उम्र की मोहलत मिली है वक्त से
जाया उस टक्साल को क्यों कर रहा?

आसमानी राहतों पर हक तेरा
क्यों है झोली कौडियों से भर रहा?

हुस्न का देखो नजारा, नाद भी
घर के घर में गौर से सुन बज रहा॥

सिर पे देवी मौत की लटकी तरार
बेरुखी से बँदगी क्यों कर रहा?

मौत मँजिल है तेरी महफिल नहीं

क्यों तू कतरा दोस्ती से फिर रहा
जोड नाता अजनबी से फिर रहा॥

मौत मँजिल है तेरी महफिल नहीं
क्यों सजाता जिंदगी से फिर रहा?

कुछ खुशी खाइश के दामन से चुरा
मोर बनके क्यों खुशी से फिर रहा॥

दाग दामन के गए अब तक नहीं
धोता उसको गँदगी से फिर रहा॥

है हकीकत से सभी का वास्ता
क्यों चुरा आँखें उसी से फिर रहा॥

लरजते अश्क आँखों के

लरजते अश्क आँखों के दिये जाते गवाही है
उन्हीं बहते हुए अश्कों से मेरी आशनाई है॥

तुम्हारी आँख में झाँका तो देखी खुद की परछाई
पलटके जो नजर देखी वहाँ तो तुम थे हरजाई॥

तुम्हारे खत में ताजा है अभी भी प्यार की खुशबू
इन्हीं भीन हुए शब्दों से न मिल पाई रिहाई है॥

पुराने जख्म ही नासूर बनके छेडते दिल को
लबों पर मुस्कराहट ये उन्होंने ही सजाई है॥

हवाएँ आज शोखी से न जाने क्यों है लहराई
सरक कर सर से आँचल पर ये चुनरी जाने क्यों आई॥

नजर से मिल नजर ने जब जलाये दीप महफिल में
उन्हीं लम्हों की यादों से जगी अब रौशनाई है॥

न तुम आए न नींद आई

न तुम आए न नींद आई निराशा भोर ले आई
तुम्हें सपने में कल देखा उसीसे आँख भर आई॥

सुहाने ख्वाब पलकों पर सजाए कल थे जो मैंने
लगा क्यों आज काँटों से लदी सूली है लटकाई॥

निराशाओं के बरपट पर लगा इक आस का बूटा
फला फूला वो कुछ ऐसे ज्यूँ सइरा में बहार आई॥

तरसना भी, तडपना भी, नसीबों की यहाँ बाजी
खरीदारों की बोली पर बिके हर चीज सौदाई॥

कभी ज्यादा कभी कम ये खुशी गम होते रहते हैं
किसी भी एक का दामन न दुनियाँ पूरा भर पाई॥

खुशी का भी छुपा गम में

खुशी का भी छुपा गम में कभी सामान होता है
कभी गम में खुशी का नाम क्यों गुमनाम होता है॥

हुई है आँख मेरी नम न जाने बज्म में भी क्यों
जहाँ जज्बे रहे गूँगे, खनक का दाम होता है॥

कद्र अरमान का करना, यही शायद गुमाँ मेरा
समझ पाना यहाँ खुद को कहाँ आसान होता है॥

सच्चाई से मैं वाकिफ हूँ, बखूबी फिर भी जाने क्यों
कभी सच को ही झुठलाना बडा आसान होता है॥

निराशा मौत सी होती है, आशा जिँदगी देवी
अँधेरों में कभी पर रौशनी का जाम होता है॥