जुदाई से नयन है नम
ग़ज़लः1
जुदाई से नयन है नम, वतन की याद आती है
बहे काजल न क्यों हरदम, वतन की याद आती है
समय बीता बहुत लंबा
हमें परदेस में रहते
न उसको भूल पाए हम, वतन की याद आती है
तड़पते हैं, सिसकते हैं, हम अपने अश्क़ पीते हैं
ज़ियादा तो कभी कुछ
कम, वतन की याद आती है
चढ़ा है इतना गहरा रंग
कुछ उसकी मुहब्बत का
हुए गुलज़ार जैसे हम, वतन की याद आती है
यहाँ परदेस में भी फ़िक्र
रहती है हमें उसकी
हुए हैं ग़म से हम बेदम, वतन की याद आती है
हमारा दिल तो होता है
बहुत मिलने मिलाने का
रुलाते फ़ासले हमदम, वतन की याद आती है
वही है देश इक ‘देवी’ अहिंसा
धर्म है जिसका
लुटाता प्यार की शबनम, वतन की याद आती है.
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देवांगन
मंदिर, मस्जिद, देवाँगन में नूर नज़र इक आता है
साधक कोई बैठा जिसमें बिन सुर साज़ के गाता है
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आओ सीखें हम अदा गुल-ख़ार से
ग़ज़लः ९
बंद कर दें वार करना अब ज़बाँ की धार से
दोस्ती की आओ सीखें हम अदा गुल-ख़ार से
अपनी मर्ज़ी से कहाँ टूटा है कोई आज तक
वो हुआ लाचार अपनी बेबसी की मार से
नज़्रे-आतिश बस्तियों में यूँ अंधेरा छा गया
साफ़ आएगा नज़र कुछ धुंध के उस पार से
करके मन की हर तरह हमने बिताई ज़िंदगी
याद कर लें अब अमल का पाठ गीता-सार से
बेख़बर खुद से सभी हैं, कौन किसकी ले खबर
सुर्ख़ियों की शोखियां झाँकें हैं हर अख़बार से
क्या है लेना, क्या है देना, दर्द से 'देवी' भला
फ़ायदा भी कुछ नहीं है दर्द के इज़हार से
देवी नागरानी
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जो है बेजुबां वो शिकायत करे क्या
ग़ज़ल: 54
सुने जो न ख़ुद ही नसीहत करे क्या
जो है बेजुबां वो शिकायत करे क्या
कहीं से मुनासिब ख़बर जो न आए
वो क़िस्मत पे अपनी अक़ीदत करे क्या
बुराई के आगे सिवा ख़ामुशी के
बताए भी कोई शराफ़त करे क्या?
मनाता रहे जश्न जो अपने ग़म का
ख़ुशी आ भी जाए तो दावत करे क्या?
जवाब ईंट का दे भी पत्थर से क्योंकर
वो इक बेज़ुबाँ है बग़ावत करे क्या
जो पहरे पे रहकर ज़मीर अपना बेचे
वो मालिक की अपने हिफाज़त करे क्या
हो दुश्मन से बढ़कर किसीकी जो किस्मत
किसी से वो देवी अदावत करे क्या
देवी नागरानी
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