Sunday, April 23, 2006

इक प्यास में हमेशा

महफिल में शमा क्यों कर अब तक मचल रही है
मधिम सी रौशनी में वो खुद ही जल रही है॥

इक प्यास में हमेशा रातें सरक रही है
तुझे देखने को आँखे अब तक तरस रही है॥

ऐसे न डूबते हम गर हाथ थाम लेते
मौजों की गोद में अब कश्ती सँभल रही है॥

था मर्ज वो पुराना जिसकी न थी दवा भी
तेरी निगाह शफा का अब काम कर रही है॥

अनजान राह पर यूँ, चलना न था मुनासिब
फिर भी चुनौती बनके हर साँस चल रही है़॥

यूँ तो किया मुतासिर मुझे जिँदगी ने देवी
क्यों ठोकरों ने जाने कर दर बदर रही है॥

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1 टिप्पणी:

At 9:19 AM, Blogger डॉ॰ व्योम उवाच...

बहुत अच्छी कविताएँ हैं...... बधाई
डॉ॰ व्योम

 

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