Sunday, April 23, 2006

न तुम आए न नींद आई

न तुम आए न नींद आई निराशा भोर ले आई
तुम्हें सपने में कल देखा उसीसे आँख भर आई॥

सुहाने ख्वाब पलकों पर सजाए कल थे जो मैंने
लगा क्यों आज काँटों से लदी सूली है लटकाई॥

निराशाओं के बरपट पर लगा इक आस का बूटा
फला फूला वो कुछ ऐसे ज्यूँ सइरा में बहार आई॥

तरसना भी, तडपना भी, नसीबों की यहाँ बाजी
खरीदारों की बोली पर बिके हर चीज सौदाई॥

कभी ज्यादा कभी कम ये खुशी गम होते रहते हैं
किसी भी एक का दामन न दुनियाँ पूरा भर पाई॥

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1 टिप्पणी:

At 4:07 AM, Blogger shyamal kishor उवाच...

aapki gajal padhi .bahut acchi lagi.ho sake to aap apanigajlo ka sangrah mere e mail par bheje .mai padhna cahta hun. shukriya
from-shyamal kishor jha
tumkur[karnataka]india
email id-shyamal79@gmail.com

 

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